याद

याद

ना प्रश्नों में , ना उत्तर में ,
ना किताबों में , ना किसी पुराने लिफ़ाफ़े में ,
खोजना अपनी हथेली में ,
जिससे तुमने मेरी हथेली थामी थी ,
वो एक गाँठ जो एक बेनाम रिश्ते की हमने कभी बांधी थी,
चलो आज इस गाँठ को खोल देते हैं ,
मेरी डोर तुम रख लेना , तुम्हारी मैं सम्भाल लेता हूँ ,
यही है जिसे हम “ याद “ कहते हैं |
 
 
Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

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