परिदों के पंख

परिदों के पंख

परिदों के पंख क्यूँ कतरने है ,
खतों पे पते क्यूँ लिखने हैं ,
सब फ़िज़ूल की बाते हैं ,
ख्वाब यहीं जनने हैं ,
लफ्ज़ यहीं मरने हैं |

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke Blog

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