” मेरे इस शहर में ‘

” मेरे इस शहर में ‘

” मेरे इस शहर में ,
बातों का कोई जिस्म नहीं होता ,
और वादे बगैर उम्र के जीते रहते हैं ।
मेरे इस शहर में ,
आदतन गले लगे दुश्मन की भी ,
पीठ पर खंजर घुपते हैं ।
मेरे इस शहर में ,
दोस्त, 
बासी अख़बार की रद्दी के भाव बिकते है ।
मेरे इस शहर में ,
जिंदगी बहुत तेज भागती है ,
और चौराहे पर बैठे भिखमंगो की तरफ ,
रिश्तों की रेज़गारी उछालती है ।
मेरे इस शहर में ,
ज़िन्दगी भी जीने के लिए ,
उम्मीदों का एक बटन दबा ,
वोट डालती हैं ,
और फिर अगली उम्मीद की ख्वाहिश में इस उम्मीद को संभालती है ।बहुत अजीब है मेरा ये शहर ,
इसका कोई नाम नहीं है ,
मगर हर कामयाबी इसकी सीढ़ियां चढ़ के गुजरती है ।
और हर नाकामयाबी
 एक उम्र दराज रण्डी कि तरह
इसके दरवाज़े की सलाख तकती है ।
मेरे इस शहर से
देखो कुछ ले कर मत जाना ,
नफरतों की फसल हर शहर में ,
सुना है जल्द ही उगती है ।

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

This Post Has 2 Comments

  1. Abhishek Maurya

    Bohot sundar likha hai chachu . Bohot depth hai is nazm mein .

    1. nikhilkapoor65

      sneh beta ji , dher saara

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