कुछ लमहे

कुछ लमहे

आज सुबह जाने कयूं ,
जेब से कुछ लमहे निकाले ,
छांट कर ,
टुकडे किये ,
पलंग के पास जमीं पर डाल दिये ,
पूरे दिन फटते हुये दूध की तरह ,
मन ,
फटफटाता रहा ,
कया बुहार दिया होगा ,
कामवाली ने उनहे ,
पडे रहते जेब में तो कया था ,
जेबें तो भरी रहने के लिये ही होती हैं |

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog : Lamhe Zindagi Ke

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