बंद फोन पे कॉल की उम्मीद रखते हैं

बंद फोन पे कॉल की उम्मीद रखते हैं

” बंद फोन पे कॉल की उम्मीद रखते हैं 

ये रिश्ते भी हमसे जाने कैसी प्रीत रखते हैं ।

दूर जाते जाते भी दूरियां कम हुई जाती है,

हम कहां रिश्तों में सड़कों की भीड़ रखते हैं ।

बात छोटी सी थी आंखों से बह गई होगी 

लोग जाने क्यूं संभाल रुमालों मे काजल की लकीर रखते हैं ।

एहसास हैं कुछ जो शायद ठहर गए हैं 

कहां जानते थे की जिस्म में हम भी एक बीज रखते हैं ।

गूंजती आवाज़ों की एक आंधी यहां है , 

और हम सन्नाटे से भी जुबां की उम्मीद रखते हैं ।

कह दो उनसे जो इंतजार करते हैं यहां ,

लौटती सुइयों पे यहां लोग नई तारीख गिनते हैं ।

देखना वो जो थक के यहां बैठें हैं ,

मरम्मत मंहगी है कबाड़ी भी यहां नई चीज रखते हैं ।’

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

Leave a Reply