अजीब खेल खेलती है तू भी

अजीब खेल खेलती है तू भी

“ अजीब खेल खेलती है तू भी
ज़िंदगी ,
मैं मूँदता हूँ बस एक पल को पलकें
और तू पड़ोस के आलीशान मकानों में
छिप जाती है ,
थक जाता हूँ जब मैं तुझे खोजते खोजते,
एक दस्तक होती है मेरे घर के दरवाज़े पे
उन मकानों से कोई
तुझे खोजने ……
मेरे घर के कच्चे आँगन में आ जाता है ।

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

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