वो जो थी मेरी दोस्ती ।
Long Poems

वो जो थी मेरी दोस्ती

” बहुत याद आती है ,
दिल के घड़े में जब जब झांकता हूं मैं ,
बूंद बूंद कर रिस गई 
वो जो थी
मेरी दोस्ती ।
बहुत याद आती है ,
दिल के घड़े में जब जब झांकता हूं मैं ,
भाप भाप उड़ गई 
वो जो थी
मेरी दोस्ती ।
भूल गया हूं अब तो शायद मैं नाम भी ,
दिल के खाली घड़े में मगर ,
आज भी गूंजते नामों में ,
बावरी सी डोलती है
मेरी दोस्ती ।
जानते थे जो कभी ,
हमे एक ही नाम से ,
भूलने लगे हैं वही अब हमारे साथ को ,
यादों का कंकर कंकर डाल
दिल के खाली घड़े से देखो ,
अब भी एक लम्हा साथ निकालने में जुटी है
मेरी दोस्ती ।
रिश्तों के नाम पे जाने कितने इन्विटेशन आते है
आज भी ,
समझता नहीं मगर कोई इसे ,
इसीलिए दिल के खाली घड़े में ,
शरारती बच्चों सा डोलती है मेरी दोस्ती ।
बदन भी होती है ,
रूह भी होती है ,
साथ भी होती है ढूर भी होती है ,
मगर कोई नाम नहीं होती है ,
इसीलिए दिल के खाली घड़े में ,
कोई नेमप्लेट नहीं खींचती है
मेरी दोस्ती।
टूटता है जब खाली घड़ा ,
एक बूंद सी उछल के दोस्त के हांथ पे जा गिरती है ,
लोग कहते हैं आंसू है वो ,
” इंतज़ार करूंगी वहां जहां और कुछ नहीं होता ,जहां हवाओं में भी बहती फिरती है
 दोस्ती ।”

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

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