तवायफ - A bronze lady statue

बिछुए की पकड़ में सुना है कुछ ख्वाब बंधे बैठे हैं,
गीले अलते के निशाँ सपनों की पगडण्डी पे नहीं मिलते।
कुछ चौखटें हैं जो जाने कब से लांघी नहीं गयीं,
सुनो इनके भीतर से दीमकों के सिसकने की आवाज़ आती है।
रात भर चाँदनी तवायफ सी पाजेब पहन आँगन में नाचती रही,
सुबह चाँद अपने जिस्म का लबादा ओढ़ कहते हैं किसी को अपना नाम देने गया है।
मर्जियाँ रोज़ चूल्हे में फूंकी जाती हैं,
बचपन से माँ कहती हैं रोटियों का फूलना जरूरी है।
ये एक थैला जो अपने जिस्म में लिए रात क़यामत से भटकती है,
भिखारी साँसों को पता भी नहीं ये भीख रात को नहीं उसे हर बार मिलती है।
कुछ सवाल हैं जो कभी पैदा ही नहीं हुए,
कहते हैं उन्हें सलीके की नज़र लग गयी |

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

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