"चाँद" Statue of a girl

शायद वो बे-चाँद की रात थी ,
और मेरी माँ नें उस शक़्स का चेहरा नहीं पढ़ा था ,
जिसने उस रात , 
आसमान को अपनी उंगली से चीरा था |

और फटे हुए आसमान से गर्म गोस्त का एक टुकड़ा ,
ज़मीन की थैली में आ गिरा था |
उस औरत ने उस टुकड़े को अपने जिस्म में ऐसे समेट लिया था , 
जैसे चाँद ने अपने दाग को कलेज़े से लगा लिया हो ,
शायद इसलिए ,
क्यूंकी उसकी माँ ने उसका नाम चाँद रखा था |

और ता उम्र अपने काजल की स्याही से , 
उसपर एक दाग बनाया था |
लेकिन उस दिन ,
हर वो उंगली ,
जिसने कभी ना कभी ,
किसी ना किसी आसमान के सीने को चीरा था |

उस चाँद की तरफ उठने लगी ,
पाक चाँद के दागदार होने की बाते होने लगीं ,
और मेरी माँ ” चाँद ” ने मेरा नाम भी ” चाँद” रख दिया |

शायद वो समझ गयी थी,
की हर चाँद पे एक दाग होता है |
जो पर्दे की आड़ में रहे तो पाकिज़गी ,
वरना गुनाह की आयात होता है |

कभी रस्मो रिवाज़ से ,
कभी मज़हब के नाम पे ,
कभी हवस के ताबूत में ,
कभी इश्क़ की किताब में ,
बस ये दाग ही बिकता है |

मर्द की निगाह में हर बार ,
प्याज़ के छिलके की तरह ,
सिर्फ़ इसका खुरंत ही छिलता है |

और मैं “चाँद” दिन बा दिन ,
चाँदनी की ओढनी ओढ़ ,
एक पाकीज़ा धूप की तरह सुलघने लगी ,
और फ़िज़ा में एक नशे की तरह घुलने लगी |

कभी कभी कोई नज़र बिवाई की तरह ,
मेरे बदन में धस जाती ,
और कभी कोई छुवन ,
फाँस सी चुभ जाती |

मैं एक पाक नदी सी ,
हर गली हर घाट गुजरती जाती ,
मगर आदम की नज़र में |

ज़िस्म की गरमाइश को बुझाने का सबब बनती जाती ,
फिर एक दिन ,
मेरी अधूरे चाँद की नथ ,
माँ ने किसी को बेच दी |

और मैं जान गयी ,
“चाँद” आसमान के लहंगे की वो करधनी है  |
जो नाभि के बहुत नीचे बाँधी जाती है ,
अगर उससे उपर हो |

तो आँगन में ,
माँ, बहन, बेटी कहलाती है |
जिनकी पाकिज़गी की लोग बातें तो करते हैं ,
मगर कस्में “गीता क़ुरान” की उठाते है ,
क्यूंकी ये जानते हैं |

“चाँद” के जिस्म के कपड़े ये हाथों से उठाते हैं ,
बाकी ये निगाहों से गिराते है ,
मगर

“चाँद” फिर भी पाकीज़ा है ,
वो नहीं भूलती ,
भूल जाते है लोग ,
की ” चाँद” के इस दाग से ही ,
आदम के बच्चे जने जाते हैं |

 

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

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