ऐ ज़िंदगी - park Gate

ऐ ज़िंदगी 
तेरी साँसों मे 
उलझे उलझे से कुछ सवाल हैं 
कुछ जवाब हैं 
हर दिन पास से गुज़र जाती है
तू
कुछ यूँ
कुछ यूँ
जैसे शाम की कटोरी में
चिल्लारों के कुछ ख़्वाब हैं ।
ऐ ज़िंदगी
तेरी साँसों में
उलझे उलझे से कुछ सवाल हैं
कुछ जवाब हैं ।
रेत पे बनाए थे
खवाबों के
कुछ महल हमने
जिसकी खिड़कियों से
गुज़रे
हवाओं के कुछ पाँव हैं ।
ऐ ज़िंदगी
तेरी साँसों में
उलझे उलझे से कुछ सवाल हैं
कुछ जवाब हैं
किस किस से मिले
किस किस से बिछड़े
शायद अब याद नहीं
बस आती जाती
साँसों पे
पाँव के कुछ निशान हैं
ऐ ज़िंदगी
तेरी साँसों में
उलझे उलझे से कुछ सवाल हैं
कुछ जवाब हैं ।
सोचता हूँ
बैठूँ , कुछ देर तो तेरे
साथ रहूँ
चिथड़ा चिथड़ा तेरे दामन की
किसी रफूगर से बात करूँ
मगर
वक़्त से पहले ही
तू गुज़र जाती है
मेरी आँखों में
फैले तेरे पाँव के
बस
दो निशान हैं
ऐ ज़िंदगी
तेरी साँसों में
उलझे उलझे से कुछ सवाल हैं
कुछ जवाब हैं 

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

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