कुछ ख़ामोशियाँ , Loneliness
कुछ ख़ामोशियाँ अजीब होती हैं ,
शब्द मौन होते हैं ,
आँखें बोलती हैं ।
जहाँ तक रूह देखती है ,
तेरी ही आवाज़ नज़र आती है ।
मैं मौन रहता हूँ ,
और इबादत हो जाती है ।
कई बार पुकारता हूँ वक़्त को
मेरे साथ आ जाओ ,
मगर झड़ गया है वो शायद ,
तेरे हाथों की सूखी मेहंदी की तरह ,
जो बुहारी तो जाती है
मगर दुबारा लगाई नहीं जाती ।
कब, क्यूँ , किसलिए ,अब हर प्रश्न बेमानी है ,
रूह गुज़रती है ,
जवाब पाने फिर ख़ुद लौट के आती है ।
 

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

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