सिगरेट के वो कश , cigarette
“ सिगरेट के वो कश ,
जो बाँटे थे हमने कभी आधे आधे ,
वो पैरों के नीचे बुझाई कुछ ,
कही अनकही बातें ,
वो चटके हुए चाय के ,
जूठे कप ,
जो रखे थे हमने फ़्लाइओवर की उतरती हुई मुँडेर पर ,
देखो वक़्त आ गया है वहाँ एक नई  सड़क बन ने का ,
एक आख़री बार चलो मिलते हैं ,
सिगरेट की उस दुकान पर
फिर अजनबी बन कर ।”
 

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

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