दिन आज कुछ , scientist and writer
दिन आज कुछ ख़ाली ख़ाली सा है ,
जैसे ख़ाली लिफ़ाफ़े में उँगलियाँ ,
किसी लापता ख़त को टटोल रही हों ,
पता है ,
जानता है दिल ,
कहीं कोई ख़त नहीं है ,
कोई एहसास नहीं है ,
फिर क्यूँ बार बार आइने की तरफ़ उठी नज़रें ,
अपने अक़्स पे पीछे किसी और के अक़्स को खोजती रहती हैं।
एक ज़िद तुम्हारी बिखरी हुई  यहाँ वहाँ ,
कभी पाँव में चुभती है , कभी आँख में किरकती है ,
और कभी कभी उँगलियाँ के पोरों पर उगने लगती है ।
मगर एक साँस है ,
जो हर बार इस उम्मीद से वापिस जाती है ,
चलो अपने भीतर ही तुझसे मिल लेते हैं ।
” लोग अक्सर कहते है हम अपने आप में मुस्कुराते हैं “
 

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

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