यार जुलाहे , weave
यार जुलाहे ,
ये जो सदियों से सुख दुःख के ताने बाने की
खेस  तू बुन रहा है ,
रंग बदलते रिश्तों के थागों की जो तू
गाँठ लगाता है ,
बेतरतीब से लगी गाँठ लोगों की निगाहों में खटकती है ,
और जो बहुत बारीकी से तू लगाता है ,
दिखती नहीं मगर ,
जब जब ओढ़ता हूँ ये खेस मैं ,
दिल पे एक खरोंच लग जाती है |
 
Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

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