कल रात ज़िंदगी जब - park bench
कल रात ज़िंदगी जब
मेरे पहलू में बैठी थी ,
कुछ नाराज़गी से पूछा मैंने उससे
क्यूँ आख़िर क्यूँ मुझे इतना सताती है ,
कहने को तू मेरी अपनी है ,
फिर बेगानों सी क्यूँ हो जाती है ,
मेरे काँधे पर टेक कर अपना सिर
बोली ज़िंदगी
एक तू ही तो यार है मेरा
संग जिसके कभी हँसती हूँ मैं
कभी उदास हो जाती हूँ ,
एक तू ही तो है जिसके साथ मैं ख़ुद को जी पाती हूँ
वरना औरों की उम्रों में तो
“मैं बस गुज़र जाती हूँ ” ।
 
 
Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

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