एक बार जिस्म को - cremation ground
एक बार जिस्म को
रूह की मोहब्बत से कुछ यूँ गिला हुआ
“ख़ाक हो जाता हूँ मैं
तुझे तो नया जिस्म मिल जाता है ।”
 
मुस्कुरा के रूह कुछ यूँ बोली ,
तू ख़ाक हो के ख़ाक में तो मिल जाता है
मेरी तो ख़ाक को भी
हर बार एक नए जिस्म से
पाक मोहब्बत करनी होती है ।
टूट तो जाती है हर कड़ी
पर कहीं कोई एक सिरा रह जाता
मैं शायद ज़मीन का वो हिस्सा हूँ
जहाँ हर जिस्म को ख़ाक बनाया जाता है |
 
 
Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke
 

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