चलो चिनाब ओढ़ आते हैं - Silhouette of a girl

चलो चिनाब ओढ़ आते हैं
पके दिनों से कुछ
बातें तोड़ लाते हैं ।
चलो चिनाब ओढ़ आते हैं
सुखा कर यादों की मुँडेर पर 
किताबों में कुछ रिश्ते छिपाते हैं ।
चलो चिनाब ओढ़ आते हैं
खिड़की के शीशे पे वो जो एक नाम
कितनी बार लिख के मिटारा था
एक बार उस शीशे के दिल का हाल
पूछ आते हैं ।
चलो चिनाब ओढ़ आते हैं
उम्र की गलियों में जाने कब से
एक ख़ानाबदोश भटकता फिरता है
जिस्म की थाली में
चलो उसे भूख परस आते हैं ।
चलो चिनाब ओढ़ आते हैं

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
Blog: Lamhe Zindagi Ke

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