एक सच और इंतज़ार
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एक सच और इंतज़ार

शाम के साथ साथ सांसें भी जैसे बीत रही थीं ।

दरवाज़े की झिरियों से आती रोशनी भी धीरे धीरे काली पड़ने लगी थी । आंखों से बही लकीर थी जो जाने कबकी सूख कर झुर्रियों में तब्दील हो चुकी थी ।फटी पपड़ी वाले सूखे होंठों से उसने कुछ पुकारने की कोशिश की , मगर आवाज़ भी अब शायद उससे नाराज़ हुई बैठी थी ।

घड़ी की सुई के साथ लम्हा लम्हा उसका दर्द भी गुजर रहा था । दर्द जिसे अब वो अब जिंदगी की तरह जीती थी , मुस्कुराते हुए जाने कब से ।चौराहे के घंटा घर में शायद १२ का घड़ियाल बजा था , पिछले १८ सालों से शायद ये घड़ी भी उसकी तरह किसी उम्मीद पर चले जा रही थी । शायद की कोई लम्हा वापस लौट आए , सिर्फ एक बार एक लम्हे के लिए । वक़्त लौटता तो रोज़ है मगर उसकी तारीखें बदल चुकी होती हैं ।

१८ साल पहले २८ नवंबर की वो रात आज भी आँखों के कोरों पर ठहरी हुई थी , वो रात जब एक जाते हुए इंसान की पीठ पर उसने इंतज़ार लिख दिया था ।

१८ साल से हर १२ बजे बजते हुए घड़ियाल की आवाज़  से वो इस इंतज़ार को दुबारा जीना शुरू कर देती थी ।एक सच था जो उस दिन बताने से रह गया था या शायद सही कहें तो उसने खुद छिपा लिया था । मुट्ठी में बंद सच जो आज तक सिर्फ वो अकेले ही जीती आयी थी । वो सच जो उसने अगर उस समय जाहिर कर दिया होता तो जिंदगी शायद कुछ और ही होती ।

उस रात ११:३० बजे  घंटाघर के चौराहे पर जब वो मिले थे , ये सच उसकी कोख में जन्म ले चुका था , कागज की एक रिपोर्ट उस सच को अपने में लपेटे उसके हाथ में थी ।उस रात जब वो मिले दोनों की आंखों में अपने अपने सपने चमक रहे थे और दोनों के हाथ में थी एक एक सच्चाई , दोनों की अपनी अपनी सच्चाई जो सिर्फ एक ही सच रह सकती थी , सांस ले सकती थी , सपना जो किसी एक की आंखों से उतर कर सच हो सकता था और दुसरे सपने को सच होने का कोई हक नहीं होता ।

” श्याम “

” निशा “

दोनों की हथेलियां साथ में जुड़ी थीं और आंखें एक दूसरे में जैसे डूबी हुई । श्याम की आंखों में कुछ सितारे से झिलमिला रहे थे , उसकी हथेलियां कांप रही थीं और होंठ कुछ कहने को थरथरा रहे थे ।

निशा ने अपनी आंखों के सपने को छिपाया और अपनी हथेली में पकड़े कागज के सच को जोर से भींच लिया ।

” श्याम , क्या बात है । क्या हुआ ।” उसने श्याम के चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों में थामते हुए कहा ।

” निशा , मुझे विश्वास है नहीं हो रहा की मेरा सपना सच होने जा रहा है । रेसीडेंसी का लेटर आ गया है यूएस से , मुझे सर्जन होते देखने का तुम्हारा सपना भी अब पूरा होगा ।” बात करते करते श्याम ने अपना चेहरा उसके कंधे पर टिका दिया । उसकी आंखों से उसका सपना बह कर निशा के कंधे को भिगो रहा था ।

” पता है अगले हफ्ते ही ज्वाइन करना है , सिर्फ तीन साल की बात है । प्लीज मेरा वेट करेगी ना । ये तेरा भी तो सपना था ना । बाउजी को चाह कर भी नहीं बता सकता अभी , सब गड़बड़ हो जाएगा । एक बार कुछ बन जाऊं । ” श्याम बिना रुके बोले जा रहा था । हथेली में पकड़े सच पर निशा की जकड़न बढ़ती जा रही थी ।

” निशा , कुछ बोल ना ” दोनों घंटा घर के चबूतरे की सीढ़ियों पर बैठे हुए थे । श्याम ने अपना सिर निशा की गोद में रख दिया था ।

” सच में , मेरा श्याम अब सर्जन बन जाएगा , बाऊजी को बताया तुमने , वो तो खुशी से पागल ही हो जाएंगे । ” श्याम के बालों में अपनी उंगलियां पिरोते हुए निशा ने कहा ।

” नहीं , सबसे पहले तेरे पास आया हूं ।  बाबा को अगर बता देता तो अब तक सारा खानदान घर पर इक्कठा हो चुका होता । “

सच में बउजी का सपना था कि उनका बेटा उनसे ज्यादा बड़ा डॉक्टर बने , बहुत बड़ा । इतना बड़ा की उसे किसी छोटे से शहर में डिस्पेंसरी खोल कर ना बैठना पड़े । उनका कोई अधूरा सपना था जो वो श्याम में पूरा होते देख रहे थे । जाने कितनी बार निशा को बैठा का वो इस सपने की कहानी सुनाया करते थे ।निशा बऊजी के कंपाउंडर की बेटी थी । आधे से ज्यादा दिन उसका हवेली में ही गुजरता था , बाऊजि भी उस बहुत लाड करते थे , हमेशा कहते , घनश्याम देखना तुम्हारी बिटिया तुम्हारा बहुत नाम करेगी । इतना होने के बाद भी मजाल है की निशा हवेली की रसोई की देहरी लांघ सके या तीज त्यौहार पर हवेली के मंदिर में विराजे राधा कृष्णा को हाथ भी लगा सके । बहुत बाद में समझ पाई वो की ये फर्क सिर्फ नाम के आगे लगे उपनाम का है ।

” मुझे एक बार कुछ बन जाने दे , फिर देखना बाउजि मेरी बात कभी भी नहीं टालेंगे । ” श्याम की इस एक बात के बाद उसकी सारी जिरह बहस खत्म हो जाती । बचपन की ये दोस्ती कब प्यार में बदली और प्यार कब वादे में पता ही नहीं चला ।

श्याम यूएस चला गया , हफ्ता कहां निकला पता भी नहीं चला , इस पूरे हफ्ते उसने अपने आप को श्याम से दूर ही रखा । डरती थी कि कहीं उसका सच श्याम के सच के आड़े ना आ जाए ।

श्याम चला गया , एक कागज का टुकड़ा उसे पकड़ा कर जिस पर लिखा था ” मेरा इंतज़ार करना , मैं वापस आऊंगा तुम्हारे लिए ।”

सच अपना वजूद बनाने लगा था , इससे पहले कि सच पर कोई उंगली उठे उसने एक दिन मां बाबा को इस सच के बारे में बता दिया । मां ने बहुत कोशिश करी की वो जान पाएं की ये सच्चाई किसकी कलम से लिखी गई है , मगर वो चाहती थी कि ये बात सबसे पहले श्याम को पता चले ।

उसने श्याम को कॉल करने की बहुत कोशिश करी मगर कोई जवाब नहीं आया , आया सिर्फ कागज का एक टुकड़ा जिसपर लिखा था” तुमसे ये उम्मीद नहीं थी की तुम अपना सच मुझसे छुपाओगी । सब ख़तम कर दिया तुमने । शायद अब तुमसे मैं कभी ना मिलूं ।”

उसने मां बाबा को कह दिया इस सच का मां और बाप सिर्फ और सिर्फ वही है । इससे ज्यादा ना वो किसी को कुछ बताना चाहती है ना समझना । मां ने अपने पल्ले से आंखें पोंछते हुए उसे अपने गले से लगा लिया ।

बाबा ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा ” कल से कॉलेज जाना शुरू कर , लॉ का फाइनल ईयर है । “बाहर कुछ आसान नहीं था , हवेली वालों ने उसके हवेली के अंदर घुसने पर पाबंदी लगा दी । किसी को सच से कुछ लेना देना नहीं था , सबको सच का नाम जानने की उत्सुकता थी । जैसे नाम के बगैर सच सच नहीं रहता ।

और फिर वो दिन भी आया जब उसकी कोख से ये सच एक शक्ल ले कर उसकी गोद में आ गया । उस के माथे को चूमते हुए उसने उस सच को अम्मा की गोद में डाल दिया ” लो अम्मा  तुम्हारा सत्यम आ गया । “

” बेटा क्या बताएगी तू इस बच्चे को इसके बारे में ” अम्मा ने सत्यम को गोद में झुलाते हुए कहा ।

” कुछ नहीं मां , सच को उसके सच के बारे में बताने की कोई जरूरत नहीं होती , वक़्त आने पर सच को अपनी सच्चाई खुद बा खुद पता चल जाती है ।” उसने कोर्ट की अपनी फाइलें संभालते हुए कहा ।

सत्यम उस समय शायद १० वीं में गया गया था , उसके ऑफिस से आते ही उसका हात पकड़ कर बोला ” मां क्या है मेरा सच , बता क्यूं नहीं देती हो । “

” मैं हूं तेरा सच , इसके आगे तू बता क्या सच जानना है तुझे , इसका मतलब तुझे अपने इस सच पर भरोसा नहीं , तुझे भी सिर्फ एक नाम चाहिए सच की जगह । और बेटा मुझे अपने सच को किसी कटघरे में खड़ा कर के उसे साबित करने के लिए गवाही नहीं देनी कोई जिरह बहस नहीं करनी । बाकी तेरी मर्ज़ी । तुझे जन्म देना मेरी सच्चाई थी मेरी मर्ज़ी , बाकी तू जो भी समझना चाहता है समझ सकता है ।” उसने अम्मा की तस्वीर को सीधा करते हुए कहा । तस्वीर में भी अम्मा की आंखों में सिर्फ ममता थी कोई सवाल नहीं ।

” ना मां , कुछ नहीं जानना मुझे तेरे आगे , में कमजोर नहीं हूं मां की दूसरों के आगे खुद को साबित करता रहूं , या पीठ दिखाता रहूं , मेरा सच ये कोख है जिसने मुझे एक अदना से अंश से एक शरीर दिया है , एक पहचान दी है , और फिर सत्यम तो खुद ही सत्य है ना मां ” सत्यम ने स्कूल की टाई खोलते हुए कहा।

वक़्त गुजरता गया उसने चौराहे वाली बड़ी हवेली वाला रास्ता बिल्कुल ही छोड़ दिया था । बाबा से आते जाते पता चलता रहता था , श्याम बहुत बड़ा सर्जन बन कर आ गया था , फिर एक दिन बाबा ने उसे मिठाई का डिब्बा पकड़ाते हुए कहा ” बाऊ जी ने भेजी है , श्याम भैया का रोका हो गया है , कम से कम मिल तो के अपने बचपन के दोस्त से।उसने डिब्बा ले कर मंदिर में कान्हा जी की मूर्ति के आगे रख दिया ।

वक़्त बीतता गया , घड़ियां अपनी जगह चुपचाप आगे बढ़ती रहीं । घंटाघर के उस खामोश चबूतरे की जगह एक बस अड्डे ने ले ली थी । जिस चबूतरे पर उनका रिश्ता परवान चढ़ा था , वह जगह  सच कह कर अख़बार बेचने वाले हॉकर्स ने ले ली थी ।

सत्यम कॉलेज में आ गया था , फिर एक दिन एक और सच एक कागज पर उसके सामने आया । उसके पास सिर्फ कुछ महीने ही बचे थे , ठीक हो पाने की कोई उम्मीद नहीं थी कैंसर की लास्ट स्टेज थी ।

घड़ी आज भी १२ बजा रही थी ।उसने अपनी सांसें गिननी शुरू कर दी थीं , आज तो डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया था । सत्यम ने गंगा जल के साथ तुलसी उसके मुंह में डाली । उसने सत्यम का हाथ पकड़ लिया ।” बेटा एक बात मानेगा ।”

” क्या बात मां “

” बेटा मेरी अर्थी चौराहे पार वाली बाऊ जी की हवेली के आगे से ले कर जाएगा , थोड़ा उल्टा जरूर पड़ेगा ।”सत्यम ने उसकी आंखों में देखा , कोई भी सवाल नहीं था उसकी आंखों में ,

” मां मैं अभी आया इंतज़ार करना मेरा । “उसने भी सत्यम को रोका नहीं ।घड़ी की सूइयां अभी भी घूम रही थीं । उसकी सांस उखड़नी शुरू हो चुकी थी , आंखें पथरा गई थी सब कुछ धुंधला हो चुका था , इंतज़ार की डोर अब टूटी तब टूटी । उसने एक आखरी बार  दरवाज़े की तरफ देखा, इंतज़ार ने सांस का साथ छोड़ दिया था। दरवाज़े पर कोई था , सत्यम और सत्यम जैसा कोई और ,मगर वो उसका सच था ,सत्यम का नहीं ।

उसने श्याम को आवाज़ देने की कोशिश करी , मगर उसकी जबान पलट चुकी थी । घड़ियाल अभी अभी १२ बजे के घंटे बजा के शांत हुआ था ।जमीन पर कुछ खतों की एक खुली हुई पोटली पड़ी थी , एक खत था जो पीला पड़ चुका था मगर शायद भेजा नहीं गया था , खत में लिखा था” जिस दिन तुम मेरे सच को हमारा सच समझ के पूछोगे , तुम्हे सच जाने की कोई जरूरत नहीं रहेगी ,श्याम ।निशा का कोई सच उसका अकेले का था ही नहीं ।”
किसी के फूट फूट के रोने की आवाज़ें आ रही थी । निशा ख़तम हो चुकी थी रात शायद अमावस की थी ।

Hindi Poetry by Nikhil Kapoor
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